स्मृतियों को सहजने का एक प्रयास

चाय, चर्चा और बैडमिंटन: ईशान पार्क की रविवार की सुबहे

हर रविवार की सुबह कुछ खास होती थी। ईशान पार्क में जब हम दोस्त इकट्ठा होते, तो सिर्फ बैडमिंटन का खेल नहीं, बल्कि दोस्ती, मस्ती और यादों का एक कारवां सजता। ये भाई दोस्त अपने-अपने कामों से थोड़ा वक्त निकालकर, जीवन की भागदौड़ से दूर, बैडमिंटन कोर्ट पर अपने हौसले के साथ उतरते।

खेल शुरू होते ही एक अनोखा ‘युद्ध’ छिड़ जाता – हार और जीत का, पर हंसी और तालियों के बीच। कभी कोई जीतता, कभी कोई हारता, लेकिन अंत में जीत होती थी उस दोस्ती की, जो इन सबके बीच और भी गहरी होती जा रही थी।

रविवार की खास चाय

खेल खत्म होते ही शुरू होता था दूसरा राउंड – चाय का। और यह चाय सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि उन बातों का जरिया होती थी जो शायद पूरे हफ्ते के बोझ को हल्का कर देती थी। चाय पर चर्चा होती – अगले मैच की रणनीति की, पुराने खेल के मजेदार पलों की, और कभी-कभी ज़िंदगी के गंभीर मुद्दों की भी। ठहाकों की गूंज और कपों की खनक के बीच वह पार्क मानो एक छोटा-सा उत्सव स्थल बन जाता।

इस पूरी दोस्ती की मिठास को और स्वादिष्ट बनाता था एक खास पहलू – भाई मृत्युंजय, जो इस टोली के एक अहम सदस्य हैं, उनका घर पार्क के ठीक सामने है। हर रविवार की यह परंपरा बन गई थी कि खेल के बाद चाय उन्हीं के घर से आती। वह चाय केवल स्वाद नहीं, अपनापन भी लाती थी। जैसे उनके घर से आती भाप से दोस्ती की गर्माहट और आत्मीयता की खुशबू उठती थी।...




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